सांप्रदायिकता और भारत विभाजन

सांप्रदायिकता मूलत: एक विचारधारा है, जो यह मानती है कि किसी धर्म विशेष के लोगों के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हित समान होते हैं और दूसरे धर्म/संप्रदाय के हितों से उनका अनिवार्य टकराव होता है. किसी खास संप्रदाय के लोगों के भौतिक हित समान होते हैं – यह धारणा ही अपने आप में अवैज्ञानिक है; परन्तु यह अवैज्ञानिक धारणा सुनियोजित तरीके से आम लोगों के दिलो दिमाग में भरी जाती है और अंतत: यह धारणा लोगों के दिमाग में घर बनाने में कामयाब होती है. इस प्रकार सांप्रदायिकता का उदय होता है.
       सांप्रदायिकता के बारे में कई गलत धारणाएँ बनी हुई हैं.. उन्हीं में से एक यह है कि सांप्रदायिकता की उत्पत्ति धर्म से होती है. वस्तुतः सांप्रदायिकता और धर्म का कोई अनिवार्य संबंध नहीं होता. सांप्रदायिकता, दरअसल एक राजनीतिक अवधारणा है,जो अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए धर्म का सहारा लेती है, उसका इस्तेमाल करती है. धार्मिक होने का अर्थ सांप्रदायिक होना कतई नहीं है. सांप्रदायिक व्यक्ति धार्मिक होने का बस ढोंग करता है. वह धार्मिकता का एक लबादा ओढ़ता है, जिसके अंदर अपने सांप्रदायिक स्वार्थों को छिपाए रखता है.
               सांप्रदायिकता के साथ एक और गलत धारणा जुड़ी हुई है कि, यह मध्यकाल से ही भारतीय समाज में व्याप्त है. मध्यकालीन भारतीय इतिहास में हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य के उदाहरण मिलते हैं, इसमें कोई शक नहीं. दोनों के धार्मिक विश्वासों और दृष्टिकोण में बड़ा फर्क़ था,जो कभी-कभी झड़पों के रूप में सामने आ जाता था दोनों में एक-दूसरे के रीति-रिवाजों को लेकर घृणा की भावना भी थी. हिंदू यदि मुसलमानों को ‘म्लेच्छ’ कह कर पुकारते थे तो मुस्लिम हिंदुओं को ‘काफ़िर’ कह कर उनका तिरस्कार किया करते थे. इन सबके बावजूद हिंदू-मुस्लिम सामंजस्य के भी ढेरों उदाहरण मिलते हैं. कला, संस्कृति, भाषा, खान-पान – हर मामले में हिंदुओं और मुसलमानों ने एक दूसरे को प्रभावित किया- यहाँ तक कि धर्म के मामले में भी.
               मुगल शासकों ने भी दोनों धर्मों के वैमनस्य को खत्म करने और एक मिश्रित संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. मुगल वंश के संस्थापक बाबर ने अपने पुत्र हुमायूँ को सीख देते हुए कहा था – “तुम कभी धार्मिक पूर्वग्रह को अपने मन पर हावी होने मत देना और सभी वर्गों की भावनाओं एवं रीति-रिवाजों को ध्यान में रखते हुए निष्पक्ष न्याय करना. विशेष रूप से, तुम गो हत्या से दूर रहना. कभी किसी समुदाय के पूजा स्थल को नष्ट मत करना.” अकबर को यह सीख बौद्धिक विरासत के रूप में मिली, जिसने उसके नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. अकबर ने धार्मिक दृष्टि से एक गैर कट्टरपंथी राज्य की स्थापना की. उसने हिंदू और मुसलमान दोनों को सत्ता में पूर्ण भागीदार बनाया. परवर्ती मुगल शासकों ने आम हिंदू जनता के साथ कठोरता बरती, पर अभिजात हिंदू पहले की तरह सत्ता में भागीदार बने रहे. हिंदू मनसबदारों की संख्या शाहजहाँ के समय के 24% से बढ़कर औरंगजेब के समय 33% तक पहुंच गयी. जहाँ तक आम जनता का सवाल था – हिंदू और मुसलमान दोनों ही शोषण के शिकार थे. हिंदू जनता ने संप्रदाय चेतन होकर कहीं मुस्लिम शासकों का विरोध किया हो, ऐसे प्रमाण नहीं मिलते. ऐसा होना संभव भी नहीं लगता, क्योंकि तत्कालीन राजनीति में न तो जनता की कोई भागीदारी थी और न ही वह राजनीतिक तौर पर इतनी जाग्रत थी.
               हिंदू-मुसलमानों के धार्मिक अलगाव को सांप्रदायिकता के स्तर पर पहुँचाने में आमतौर पर ब्रिटिश शासन की नीतियों को उत्तरदायी माना जाता है. अंग्रेजों ने मुस्लिम शासकों से सत्ता छीनी थी, इसलिए स्वाभाविक तौर पर वे मुसलमानों को और मुसलमान उन्हें संदेह की नजर से देखते थे. ब्रिटिश शासन के आरंभिक दौर में नीतियाँ आमतौर पर मुस्लिम विरोधी ही रही. अंग्रेजों का यह रुख 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक बना रहा. ग़ौरतलब है कि, यही समय भारतीय राष्ट्रवाद के उदय का भी है.
      उपनिवेशवादियों का तर्क था कि, भारत एक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक भौगोलिक शब्द मात्र है, जो वास्तव में विभिन्न धर्मों और जातियों के लोगों का समूह है. इसके उलट, राष्ट्रवादियों के अनुसार, एक राष्ट्र बनने की ओर तेजी से अग्रसर था. 26 जुलाई 1876 को आनंद मोहन बोस और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने ‘इंडियन एसोसिएशन’ की स्थापना की, जिसके नाम में ‘इंडियन’ का प्रयोग निश्चय ही गहरे अर्थ ध्वनित करता है. इंडियन एसोसिएशन ने ‘वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट’ और ‘आर्म्स एक्ट’ का अखिल भारतीय स्तर पर विरोध कर इस धारणा को तगड़ा झटका दिया कि भारत एक राष्ट्र नहीं हो सकता है. राष्ट्रवादी आंदोलन के उदय से अंग्रेज चौकन्ने हो उठे और उन्होंने तेजी से विकसित हो रही राष्ट्रीय एकजुटता की भावना को खत्म करने की कोशिशें प्रारंभ कर दीं.
        तत्कालीन आंदोलन का नेतृत्व मुख्य रूप से हिंदुओं के हाथों में ही था, इसलिए उनकी काट के रूप में अंग्रेजों ने मुस्लिम जमींदारों, उच्च वर्ग तथा नवशिक्षितों को अपनी ओर खींचना शुरु किया. अल्पसंख्यकों की रक्षा का हवाला देकर अंग्रेजों ने हर क्षेत्र में सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा दिया. यहाँ इस बात पर विचार करना जरूरी है कि वो कौन से कारण थे, जिन्होंने मुसलमानों को अंग्रेजों की सांप्रदायिक नीति का हामी बनाया और हिंदू एवं मुस्लिम को ‘हिंदुस्तान रूपी खूबसूरत दुल्हन की दो आँखें’ मानने वाले सर सैय्यद अहमद खान भी अंग्रेजों की जुबान बोलने लगे.
        इस सवाल का जवाब  तत्कालीन सामाजिक राजनीतिक परिस्थितियों में ही दिखता है. ब्रिटिश सरकार की आर्थिक नीतियों ने बड़े पैमाने पर बेरोजगारी को जन्म दिया और यह बेरोजगारी शिक्षित मध्यवर्ग तथा निम्न वर्ग के लिए एक विकट समस्या बन गई. ऐसी स्थिति में जब ब्रिटिश सरकार ने मुसलमानों को खुश करने के लिए उन्हें नौकरियों में आरक्षण देना शुरु किया तो बेकारी से त्रस्त नव शिक्षित मुसलमानों का उनकी ओर आकर्षित होना स्वाभाविक ही था. सैय्यद अहमद खाँ को भी अपने अलीगढ़ कॉलेज के लिए ब्रिटिश अधिकारियों के सहयोग की जरूरत थी. साथ ही, उन्हें यह भी लगा कि ब्रिटिश सरकार का साथ देकर मुसलमानों के लिए अधिक आर्थिक सुविधाएँ प्राप्त की जा सकती हैं. सैय्यद अहमद और उनके समर्थकों ने मुसलमानों की वफादारी के बदले सरकारी नौकरियों और विधायिकाओं में आरक्षण के साथ विधान परिषद् में हिंदुओं के बराबर संख्या की मांग की. सैय्यद अहमद ने मुसलमानों को राजनीति से दूर रहने की सलाह दी और उन्हें कोई राजनीतिक संगठन बनाने या कांग्रेस जैसे संगठन से संबंध रखने से परहेज करने को कहा. उनकी मृत्यु के बाद भी उनके अनुयायी इसी नीति पर चलते रहे. ब्रिटिश सरकार को भी यही स्थिति पसंद थी. उसने अपने वफादार मुसलमान जमींदारों एवं उच्च वर्गों को मुसलमानों के लिए एक राजनीतिक संगठन बनाने को प्रेरित किया, ताकि मुस्लिम युवकों के कांग्रेस की ओर जाने की किसी भी संभावना को समाप्त किया जा सके. इसी नीति के तहत 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई. मुस्लिम लीग ने सैय्यद अहमद की अंग्रेजों के प्रति वफादारी की नीति जारी रखी और उन सभी सांप्रदायिक मांगों को अंग्रेजों के समक्ष रखना शुरु किया, जिन्हें सैय्यद अहमद और उनके सहयोगी उठाते रहे थे. अंग्रेजों ने इन मांगों को लगातार प्रोत्साहित किया. कांग्रेस के कुछ नेताओं ने जाने अनजाने अपने कृत्यों और बयानों से कांग्रेस की हिंदू परस्त छवि निर्मित करनी शुरु की, जिसने अंग्रेजी योजना को आगे बढ़ाने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाई. मुस्लिम लीग ने बंग भंग का समर्थन करके तथा हर मंच पर कांग्रेस का विरोध करके यह स्पष्ट कर दिया कि उसका विरोध ब्रिटिश सरकार से नहीं, बल्कि कांग्रेस और हिंदुओं से था. 
           मुस्लिम लीग की स्थापना के कुछ ही समय बाद 1908 में पंजाब हिंदू सभा की स्थापना बी एन मुखर्जी और लालचंद ने की, जिसने तेजी से बढ़ रही हिंदू सांप्रदायिकता को भी एक मंच प्रदान कर दिया. उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशकों से ही गो वध और हिंदी-उर्दू विवाद जैसे कई मुद्दों को लेकर दोनों संप्रदायों के बीच तनाव की स्थिति बन रही थी, जिसे हिंदू सभा की स्थापना ने एक संस्थागत रूप दे दिया. हिंदू सभा और मुस्लिम लीग – दोनों में एक बड़ी समानता थी कि ये दोनों ही कांग्रेस का विरोध करते थे और ब्रिटिश राज का वरद् हस्त चाहते थे. हिंदू संप्रदायवादियों ने भी विधायिकाओं में ‘हिंदू सीटों’ की मांग की. लेकिन, सरकार का दोनों संप्रदायों को तुष्ट करने का कोई इरादा नहीं था, इसलिए हिंदू संप्रदायवादियों को निराश होना पड़ा. यही कारण है कि परवर्ती राजनीति में हिंदू संगठनों की वैसी निर्णायक भूमिका नहीं दिखती, जैसी मुस्लिम लीग की. 
            बाद के समय में बाल गंगाधर तिलक, मुहम्मद अली जिन्ना और एनी बेसेंट के प्रयत्नों से कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच निकटता दिखती है. 1916 में दोनों के बीच लखनऊ समझौता भी होता है, लेकिन मुस्लिम लीग के साथ समझौता करके एक तरह से कांग्रेस ने उसकी सांप्रदायिक राजनीति को अघोषित स्वीकृति ही प्रदान की. गाँधी के खिलाफ़त आंदोलन को भले ही हिंदू – मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता हो, था यह सांप्रदायिक राजनीति का तुष्टीकरण ही. खिलाफ़त के मूल में तुर्की के खलीफा के साथ हुए दुर्व्यवहार का विरोध करना था, इसलिए गाँधी द्वारा आंदोलन वापस लेने के बाद मुसलमान न सिर्फ़ राष्ट्रीय आंदोलन से कटे, बल्कि उनकी उभरी हुई धार्मिक चेतना ने सांप्रदायिकता की आग को और भड़काया. इस प्रकार, जाने अनजाने गाँधी और कांग्रेस ने सांप्रदायिकता के प्रसार में अपना योग दिया. उल्लेखनीय है कि असहयोग आंदोलन के साथ खिलाफ़त को जोड़ने के गाँधी के फैसले के विरोधियों में मुहम्मद अली जिन्ना भी थे. असहयोग आंदोलन वापस ले लिया गया, जबकि दूसरी ओर, तुर्की में प्रजातंत्र की स्थापना ने खिलाफ़त की समाप्ति की घोषणा कर दी. लेकिन खिलाफ़त को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ना एक ऐसा कदम था, जिसके दूरगामी दुष्परिणाम हुए. खिलाफ़त आंदोलन के पश्चात स्थिति इतनी बिगड़ी कि कुछ राष्ट्रवादी माने जाने वाले नेता भी सांप्रदायिक शक्तियों के साथ हो गये. लाला लाजपत राय और मदनमोहन मालवीय जैसे नेता हिंदू महासभा में शामिल हो गए तो दूसरी ओर, मुहम्मद अली तथा शौकत अली जैसे नेताओं ने कांग्रेस पर हिंदू राज की स्थापना की कोशिश का आरोप लगाया. 
       इस प्रकार, सांप्रदायिकता धीरे-धीरे उग्र रूप धारण करने लगी. 1937 के चुनावों में कांग्रेस की जीत ने जमींदारों और भूस्वामियों को अपने भविष्य के लिए चिंतित करना शुरु कर दिया, क्योंकि कांग्रेस की राजनीति में समाजवादियों का दखल बढ़ता जा रहा था, जो लगातार इन सामंतों का विरोध कर रहे थे. जमींदारों और पूँजीपतियों ने इसी कारण कांग्रेस को कमजोर करने के लिए सांप्रदायिकता को आक्रामक बनाने की कोशिश की. इस आक्रामक सांप्रदायिकता पर प्रहार करने की बजाय कांग्रेस की सरकारों ने इसके शमन के लिए हिंदू तुष्टीकरण की राजनीति शुरु कर दी. सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् गायन, कुछ राज्य सरकारों द्वारा गो वध पर पाबंदी, कांग्रेस प्रायोजित शिक्षा की विद्या मंदिर योजना आदि कई ऐसे कार्य 1937 की प्रांतीय सरकारों ने शुरु किये, जिसे मुस्लिम लीग ने खुलेआम मुस्लिम विरोधी कहा और कांग्रेस की ‘हिंदू परस्ती’ को निशाना बनाया. ‘डैमेज कंट्रोल’ के लिए कांग्रेस ने संपूर्ण वंदे मातरम् के स्थान पर उसके शुरुआती दो छंदों को गाये जाने की घोषणा की, लेकिन वंदेमातरम् और आनंद मठ की मुस्लिम विरोधी छवि से पीछा नहीं छुड़ा पाए. 
1937 के चुनावों में  लीग को मुस्लिम सीटों पर भी कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली. इसके बावजूद, जिन्ना कांग्रेस के साथ प्रांतों में गठबंधन सरकार बनाने के इच्छुक थे. कांग्रेस और लीग के बीच कई बार वार्ता हुई, लेकिन दोनों पक्ष किसी सर्वसम्मत फैसले पर नहीं पहुंच सके. सरकार में लीग को शामिल नहीं करने के कांग्रेस के फैसले को जिन्ना ने कांग्रेस की मुस्लिम विरोधी नीति का परिणाम बताया. 
          बुंदेलखंड उपचुनाव को मुस्लिम लीग ने पूरी तरह सांप्रदायिक प्रचार के दम पर जीता. कांग्रेस सरकारों की तथाकथित मुस्लिम विरोधी नीतियों पर लीग ने कई रिपोर्ट्स जारी की जिनमें पीरपुर रिपोर्ट, शरीफ़ रिपोर्ट, मुस्लिम सफरिंग अंडर कांग्रेस रूल आदि उल्लेखनीय हैं. 1939 में विश्वयुद्ध में भागीदारी के मुद्दे पर जब कांग्रेसी सरकारों ने इस्तीफा दिया तो मुहम्मद अली जिन्ना के निर्देश पर मुस्लिम लीग ने इसे मुक्ति दिवस (Day of Deliverance-22 दिसंबर 1939) के रूप में मनाया. सही मायनों में देखें तो विभाजन का वास्तविक सूत्रपात 1937-39 के दौरान ही हुआ. यूँ द्विराष्ट्र सिद्धांत की चर्चा काफी पहले शुरु हो गयी थी, लेकिन कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने इससे दूरी बना रखी थी. विनायक दामोदर सावरकर और मुहम्मद इकबाल जैसे लोग खुल कर द्विराष्ट्र के सिद्धांत का समर्थन कर चुके थे. चौधरी रहमत अली ने तो गोलमेज सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान की मांग के समर्थन में पर्चे भी बाँटे थे, लेकिन तब जिन्ना ने उनकी मांग को बचकाना करार दिया था. अब बदली हुई परिस्थितियों में वही जिन्ना द्विराष्ट्र के पैरोकार हो गये और 1940 में मुस्लिम लीग ने आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान की मांग पेश कर दी. नेहरू ने स्वयं राजेन्द्र प्रसाद को लिखे एक पत्र में स्वीकार किया कि वो ‘आम मुसलमान के मन में मौजूद कांग्रेस विरोधी भावना को नियंत्रित नहीं कर पाए.’ 
       हिंदू संप्रदायवादियों की बढ़ती आक्रामकता मुस्लिम लीग के विभाजन की मांग को वैधता प्रदान कर रही थी. विनायक दामोदर सावरकर ने आरोप लगाया कि मुसलमान हिंदुओं को उनके ही देश में गुलाम बनाना चाहते हैं. लगभग इसी समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने महाराष्ट्र के बाहर पाँव पसारने शुरु किये. संघ का कहना था कि ‘यदि गैर हिंदुओं को भारत में रहना है तो हिंदू धर्म का सम्मान सीखना होगा और हिंदू-जाति की श्रेष्ठता स्वीकार करनी होगी.’ लीग ने इन बयानों का इस्तेमाल मुसलमानों में कांग्रेस और हिंदुओं के प्रति भय स्थापित करने के लिए किया. कांग्रेस सरकारों के समय प्रांतों में हुए 60 से अधिक दंगों को उदाहरण के तौर पर पेश किया गया. बंगाल और पंजाब के मुस्लिम किसानों को समझाया जा रहा था कि पाकिस्तान बनने पर हिंदू जमींदारों और बनियों द्वारा किये जाने वाले शोषण का अंत हो जाएगा. हिंदू व्यापारियों की प्रतिस्पर्धा से मुक्त होने से छोटे मुसलमान व्यापारियों को लाभ होगा. मुस्लिम शिक्षित वर्ग को नौकरियाँ मिलने में आसानी होगी. 1940-45 के बीच में लीग के जनाधार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. अब लीग अपने शुरुआती दौर वाली लीग नहीं रही, जिस सिर्फ़ मुस्लिम जमींदारों और उच्च वर्ग का समर्थन प्राप्त था, बल्कि धीरे-धीरे आम मुस्लिम जनमानस भी उससे जुड़ने लगा, जिसने 1937 में लीग को पूरी तरह नकार दिया था. 
1945 के चुनावों में मुस्लिम लीग ने मुस्लिम सीटों पर जबर्दस्त सफलता हासिल हुई. इसके विपरीत, हिंदू महासभा की बुरी तरह हार हुई. यहाँ यह उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने 1938 में ही हिंदू महासभा के सदस्यों को कांग्रेस की सदस्यता के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था. लेकिन इसके बावजूद, 1945 के चुनावों में कांग्रेस से हिंदूवादियों को बड़ी संख्या में टिकट दिये गये और उन्होंने जीत भी हासिल की. इन चुनावों में पार्टी का चेहरा नेहरू ही थे, लेकिन टिकट वितरण पूरी तरह से पटेल के हाथों में था. इन चुनावों में हुए सांप्रदायिक मतदान ने जैसे विभाजन की अपरिहार्यता पर मुहर लगा दिया. 
स्वतंत्रता के लिए होने वाली सारी वार्ताएँ जिन्ना की पाकिस्तान की मांग पर आकर अटक जाती. जिन्ना ने दबाव बनाने के लिए 16 अगस्त 1946 को सीधी कार्यवाही दिवस की घोषणा की, जिसके बाद कलकत्ता, नोआखाली (बंगाल) संयुक्त प्रांत और पंजाब में भयानक सांप्रदायिक दंगे प्रारंभ हो गये. कलकत्ता में मुख्यमंत्री सुहरावर्दी (मुस्लिम लीग) ने न सिर्फ 16 अगस्त को सरकारी छुट्टी घोषित कर दी, बल्कि दंगों में पुलिस और सेना के किस हस्तक्षेप से भी इंकार कर दिया. दंगे लीग प्रायोजित थे और शुरुआत में मुस्लिम ही आक्रमणकारी थे, लेकिन तथ्य यह है कि इनमें मारे जाने वालों में ज्यादा संख्या मुसलमानों की ही थी. सरदार पटेल ने स्टैफर्ड क्रिप्स को लिखे एक पत्र में यह स्वीकार किया कि दंगों में हिंदुओं का पलड़ा भारी रहा. 25 अक्टूबर को बिहार में नोआखाली दंगों के विरोध में नोआखाली दिवस मनाने की घोषणा की गयी, जिसमें हुई छोटी झड़पें शीघ्र ही भीषण दंगों में बदल गयीं. पंजाब में खिज्र खान की सिखों द्वारा समर्थित सरकार लीग की सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद गिर गयी. विरोध में सिखों ने लाहौर विधानसभा के सामने प्रदर्शन किया जिसमें तारासिंह ने ‘राज करेगा खालसा’ का नारा उछाला. इसके बाद पूरे पंजाब में दंगे प्रारंभ हो गये. नेहरू की अंतरिम सरकार इन दंगों को रोकने में पूर्णतया विफल रही. एक तो ब्रिटिश प्रशासन का असहयोग, दूसरा कांगेस के भीतर के दक्षिणपंथियों का दबाव इसके लिए उत्तरदायी माने जा सकते हैं. 
26 अक्टूबर 1946 को वायसराय लॉर्ड वैबेल के दबाव में मुस्लिम लीग को अंतरिम सरकार में शामिल कर लिया गया. मार्च 1947 में लीगी वित्तमंत्री लियाकत अली खान ने बजट पेश किया, जिसमें बड़े उद्योगपतियों पर भारी कर लगाए गए थे. उल्लेखनीय है कि उस समय अधिकांश बड़े उद्योगपति हिंदू थे. वैबेल ने इसे चतुराई भरी चाल कहा, क्योंकि कांग्रेस चाह कर भी इस बजट का विरोध नहीं कर सकती थी. दूसरी ओर, बिहार दंगों ने नेहरू और पटेल के बीच की खाई को और बढ़ा दिया. नेहरू बिहार के दंगों के लिए हिंदू संप्रदायवादियों की ‘खुली निंदा’ चाहते थे, जबकि पटेल इसके विरोध में थे. शुरुआत में विभाजन का विरोध करने वाले नेहरू और पटेल जैसे कांग्रेसी नेता भी अब विभाजन को स्वीकार करते दिख रहे थे. 10 मार्च 1947 को नेहरू ने वैबेल के सामने यह स्वीकार कर लिया कि अब बंगाल और पंजाब का विभाजन ही वास्तविक उपाय है. अप्रैल 1947 में कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जे बी कृपलानी ने पत्र लिखकर वैबेल को सूचित किया कि कांग्रेस पाकिस्तान को स्वीकार करने के लिए तैयार है बशर्ते ‘पंजाब और बंगाल का न्यायपूर्ण बँटवारा हो.’ गाँधी ने सिर्फ़ शीघ्रातिशीघ्र सत्ता प्राप्ति के लिए विभाजन को स्वीकार करने के लिए कांग्रेस की निंदा की, लेकिन अब कांग्रेस में गाँधी की बात सुनने वाला कोई नहीं था. अपने निजी दूत सुधीर घोष के माध्यम से उन्होंने कांग्रेस के पास प्रस्ताव भेजा कि जिन्ना को भारत का प्रधानमंत्री बनने दिया जाय, लेकिन कांगेस ने इस ‘पागलपन’ को सिरे से नकार दिया. निराश गाँधी ने पटेल के लिए कहा – ‘तुम वह सरदार नहीं हो, जिसे मैं जानता हूँ.’ 
कांग्रेस के सैद्धांतिक तौर पर विभाजन के लिए सहमत होने के बाद 20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड एटली ने हाउस ऑफ कॉमन्स में भारत की सत्ता जून 1948 तक हस्तांतरित कर देने की घोषणा की. इसी लक्ष्य के साथ माउंटबेटन को वायसराय बना कर भारत भेजा गया. माउंटबेटन का काम ज्यादा कठिन नहीं था, क्योंकि विभाजन सहित स्वतंत्रता को सिद्धान्तत: दोनों दल (कांग्रेस और मुस्लिम लीग) स्वीकार कर चुके थे. 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ , लेकिन कीमत बहुत बड़ी चुकानी पड़ी. आजाद भारत एक अपंग भारत था, जिसका एक अंग उससे काट कर अलग कर दिया गया. यह विभाजन भारत ही नहीं बल्कि विश्व इतिहास की क्रूरतम घटनाओं में से थी. विभाजन से पूर्व और बाद के सांप्रदायिक दंगों ने लाखों लोगों की जानें ली, हजारों स्त्रियों की अस्मत दंगाइयों ने लूट लीं. करोड़ों लोगों को बेघर होकर शरणार्थियों का जीवन बिताना पड़ा.